जनरल मनोज मुकुंद नरवणे का संविधान की बात करना कितना अहम है

''भारतीय सेना भारत के संविधान की शपथ लेती है और संवैधानिक मूल्यों को ध्यान में रखते हुए ही काम करती है. न्याय, बराबरी, समानता और बंधुत्व के सिद्धांत भारतीय सेना को हमेशा राह दिखाते रहेंगे.''

ये बातें भारत के आर्मी चीफ़ जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने शनिवार को नई दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में कहीं. थलसेना प्रमुख के तौर पर यह उनकी पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस थी, इसलिए पत्रकार और विश्लेषक उनकी बातों को बारीक़ी से जांच-परख रहे हैं.

अब से कुछ हफ़्तों पहले ही पूर्व सेनाध्यक्ष बिपिन रावत नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करने वालों के बारे में एक बयान देकर सुर्खियों में आए थे.

उन्होंने कहा था, ''नेता को नेतृत्व से ही जाना जाता है. अगर आप प्रगति के रास्ते पर ले जाते हैं तो आपके पीछे हर कोई हो जाता है. नेता वही है जो लोगों को सही दिशा में ले जाता है. नेता वो नहीं होता जो अनुचित दिशा में ले जाए. हम देख रहे हैं कि कॉलेज और यूनिर्सिटी में जो विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं उनमें हिंसा और आगज़नी हो रही है. यह कोई नेतृत्व नहीं है."

बिपिन रावत के इस बयान पर विवाद खड़ा हो गया था. आलोचकों ने उनके इस बयान को 'राजनीतिक' और एक सैन्य अधिकारी के लिए अनुचित माना. रावत के इस बयान के बाद 'सेना के राजनीतीकरण' की बात भी कही जाने लगी थी.

अब कुछ हफ़्तों बाद जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की प्रेस कॉन्फ्रेंस से विश्लेषकों को चीज़ें बदलती हुई दिखाई दे रही हैं.

भारतीय नौसेना में अपनी सेवा दे चुके रक्षा विशेषज्ञ सी. उदय भास्कर जनरल नरवणे के ताज़ा बयान को काफ़ी सकारात्मक मानते हैं.

उन्होंने बीबीसी से बातचीत में कहा, ''जनरल नरवणे ने वैसे तो कोई नई बात नहीं कही है लेकिन आज के माहौल में इसकी बहुत अहमियत है. सेना प्रमुख के तौर पर अगर उन्होंने संवैधानिक मूल्यों और मानवाधिकारों की बात की है तो यह निश्चित तौर पर उम्मीद देने वाला संकेत है.''

जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद-370 का ख़ात्मा, फिर नेशनल सिटिजन रजिस्टर (एनआरसी) और नागरिकता संशोधन क़ानून (सीएए) जैसे मुद्दों से देश के विभिन्न हिस्सों में तनाव का महौल रहा है.

उदय भास्कर मानते हैं कि इस तनाव की वजह से आम जनता का संवैधानिक संस्थाओं में भरोसा कहीं न कहीं कम हुआ है. इसलिए सेना प्रमुख से संवैधानिक और मानवीय उसूलों की बात सुनकर लोगों की सेना में विश्वसनीयता बढ़ेगी.

वो कहते हैं, ''सेना प्रमुख देश के नागरिकों में ये संदेश ज़रूर जाएगा कि भारतीय सेना संविधान और क़ानून के दायरे में रहकर ही अपना काम करेगी.''

सेना के लिए युद्धक्षेत्र में या संवेदनशील इलाकों में मानवाधिकारों का ध्यान रखते हुए काम करना कितना मुश्किल होता है?

इसके जवाब में उदय भास्कर कहते हैं, ''जंग में किसी भी सैनिक के लिए कोई भी चीज़ आसान नहीं होती. संवेदनशील इलाकों में कोई भी क़दम उठाना काफ़ी चुनौतीपूर्ण होता है.

सैनिकों को मिलने वाले प्रशिक्षण में संवैधानिक मूल्यों और मानवाधिकारों पर कितना ज़ोर दिया जाता है?

इस बारे में उदय भास्कर कहते हैं, ''सैन्य प्रशिक्षण मानवाधिकारों और संवैधानिक मूल्यों को बहुत संज़ीदगी से लिया जाता है. जैसे-जैसे किसी सैनिक की रैंकिंग बढ़ती जाती है और वो ऊंचे ओहदे पर जाता है, वैसे-वैसे उनकी ज़िम्मेदारी भी बढ़ती जाती है. जूनियर रैंक में प्रोफ़ेशनल ट्रेनिंग पर ज़्यादा ज़ोर दिया जाता है लेकिन पद बढ़ने के साथ ही प्रशिक्षण का दायरा भी बढ़ता जाता है."

उदय भास्कर ने इस बारे में अपने निजी अनुभव का भी ज़िक्र किया. वो याद करते हैं, ''ये 70 के दशक की बात है जब मैं जूनियर रैंक पर था. मुझे याद है कि हमारे सीनियर अधिकारियों को बार-बार ये हिदायत दी जाती थी कि वो धर्म और राजनीति से दूर रहकर निष्पक्ष रूप से अपनी ड्यूटी करें.''

ऑबज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन में सीनियर फ़ेलो और रक्षा मामलों के जानकार सुशांत सरीन भी उदय भास्कर से सहमति जताते हैं.

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, ''फ़ौज में मानवाधिकारों और संवैधानिक मूल्यों को बहुत महत्व दिया जाता है. फ़ौज के ट्रेनिंग मॉड्यूल में मानवाधिकार और क़ानूनी दायरों के बारे में बहुत गंभीरता से बताया जाता है. चाहे वो छोटी रैंकिंग सैनिक हो या ऊंचे ओहदे वाला फ़ौजी अफ़सर, सभी को ये स्पष्ट निर्देश दिए जाते हैं कि कोई भी कार्रवाई क़ानून के दायरे में ही होगी.''

सुशांत सरीन कहते हैं कि किसी भी सरकार के लिए ये मुनाबिस नहीं होगा कि वो सेना को असीमित अधिकार दे दे या खुला छोड़ दे. उन्होंने कहा, ''सरकार का दायित्व को हिंसा और अशांति पर काबू पाना ज़रूर है लेकिन काबू पाने की तरीका न्यायसंगत और विवेकपूर्ण होना चाहिए.''

सोसायटी फ़ॉर पॉलिसी स्टडीज़ (एसपीएस) के निदेशक उदय भास्कर का मानना है कि भारतीय सेना में मानवाधिकारों के उल्लंघन को बेहद गंभीरता से लिया जाता है. वो कश्मीर में मेजर गोगोई के वाकये की याद दिलाते हैं.

ऐसी ख़बरें आई थीं कि मेजर लीतुल गोगई श्रीनगर में एक स्थानीय लड़की के साथ होटल में गए थे और वहां उनका कुछ लोगों के साथ झगड़ा हुआ था. मामला सुर्खियों में आने पर सेना की आंतरिक जांच के बाद मेजर गोगोई का कोर्ट मार्शल किया गया था.

ये सब उन मेजर गोगोई के साथ हुआ जिन्हें एक कश्मीरी युवक को मानव ढाल बनाकर जीप से बांधे जाने के के बाद तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत से प्रशस्ति पत्र मिला था. उस वक़्त उन्हें मीडिया के एक तबके में 'हीरो' की तरह पेश किया गया था.

'द जिहाद फ़ैक्ट्री' और 'पाकिस्तान्स इस्लामिक रिवॉल्यूशन' इन मेकिंग जैसी किताबों के लेखक सुशांत सरीन का मानना है कि भारतीय सेना के भीतर अनुशासन काफ़ी सख़्त है, इसलिए नियमों के उल्लंघन पर सज़ा भी बहुत सख़्त मिलती है.

सरीन दोषी सैनिकों को मिलने वाली सज़ा की जानकारी सार्वजनिक किए जाने की वकालत करते हैं.

वो कहते हैं, ''अगर आम नागरिकों को पता चलेगा कि ग़लती करने पर सेना के जवान को भी सज़ा होती है तो उसका सेना पर भरोसा बढ़ेगा. हालांकि, आम तौर पर सेना अपनी आंतरिक कार्रवाइयों को सार्वजनिक नहीं करती क्योंकि इसका सैनिकों के मनोबल पर प्रतिकूल असर पड़ता है.''

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